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ग्रह

ग्रह, अभी

सजीव सिडरियल स्थितियाँ, वक्री अवस्था, गोचर और ग्रहण — लाहिरी अयनांश से गणना, वही प्रणाली जो आपकी वैदिक कुंडली में है।

ग्रह स्थिति
अभी सभी नौ ग्रह कहाँ हैं — सिडरियल राशि व अंश।
अभी वक्री
आज कौन-से ग्रह वक्री हैं, और वक्री का अर्थ।
गोचर
किसी भी तिथि व समय के लिए ग्रह गोचर।
ग्रहण
आगामी सूर्य व चंद्र ग्रहण, सूतक काल और अर्थ।
नवग्रह
नौ ग्रह, उनके देवता, कारकत्व और स्वामित्व।
ये गोचर आपके लिए क्या कहते हैं?

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ग्रह आपकी कुंडली को कैसे आकार देते हैं

वैदिक ज्योतिष में नौ ग्रह कुंडली के इंजन हैं। जन्म की स्थिर स्थितियाँ आपके स्वभाव व संभावनाओं को बताती हैं, जबकि उनकी निरंतर गति — गोचर — और ग्रह-दशाएँ (विंशोत्तरी दशा) यह तय करती हैं कि वे संभावनाएँ कब फलित होंगी। ग्रह का प्रभाव उसकी राशि (उच्च, नीच या स्वराशि), स्वामित्व व भाव, वक्री या अस्त अवस्था, और अन्य ग्रहों की युति पर निर्भर करता है।

गोचर बनाम दशा

कोई ग्रह कब फल देगा, यह दो घड़ियाँ तय करती हैं। गोचर वह है जहाँ ग्रह आज आकाश में है, आपके भावों से गुज़रता हुआ — यही स्थिति व वक्री पृष्ठ दर्शाते हैं। दशा जन्म से चलने वाला विंशोत्तरी चक्र है, जिसमें प्रत्येक ग्रह कुछ वर्ष शासन करता है (केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चंद्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19, बुध 17)। फल प्रायः तब पकता है जब ग्रह दोनों में प्रबल हो — उसकी दशा सक्रिय हो और अनुकूल गोचर आए।

वक्री, अस्त और बल

ग्रह का बल उसकी अवस्था से बदलता है। वक्री ऊर्जा को अंतर्मुखी करता है और चेष्टा बल में बलवान गिना जाता है। अस्त (सूर्य के अति निकट) ग्रह को निर्बल करता है, इसीलिए मुहूर्त नियम विवाह हेतु अस्त गुरु या शुक्र से बचते हैं। बल सर्वाधिक महत्वपूर्ण है: उच्च या स्वराशि का ग्रह पूर्ण व स्वच्छ फल देता है, जबकि नीच का ग्रह तब तक संघर्ष करता है जब तक नीचभंग उसे न उठाए। हमारा स्थिति पृष्ठ प्रत्येक ग्रह का सजीव बल व वक्री अवस्था दर्शाता है।

ग्रहों के उपाय

जब कोई ग्रह निर्बल या कष्टकारी हो, परंपरा उसे सामंजस्य में लाने के उपाय देती है — उसका बीज मंत्र जप, उचित परीक्षण के बाद उसका रत्न धारण, उसके वार पर संबंधित वस्तुओं का दान, उपवास, और उसके देवता की पूजा। नवग्रह पृष्ठ प्रत्येक ग्रह का रत्न, बीज मंत्र, वार व सरल उपाय देता है। उपाय व्यावहारिक प्रयास का पूरक हों, विकल्प नहीं; और रत्न विशेषकर योग्य ज्योतिषी की सलाह पर ही धारण करें।

नौ ग्रह एक नज़र में

  • सूर्यआत्मा, पिता, अधिकार व स्वास्थ्य; सिंह राशि का स्वामी, रत्न माणिक्य।
  • चंद्रमन, भावनाएँ व माता; कर्क का स्वामी, रत्न मोती।
  • मंगलऊर्जा, साहस, भूमि व भाई; मेष-वृश्चिक का स्वामी, रत्न मूँगा।
  • बुधबुद्धि, वाणी व व्यापार; मिथुन-कन्या का स्वामी, रत्न पन्ना।
  • गुरुज्ञान, धन, संतान व भाग्य; धनु-मीन का स्वामी, रत्न पुखराज।
  • शुक्रप्रेम, विवाह, कला व सुख; वृषभ-तुला का स्वामी, रत्न हीरा।
  • शनिकर्म, अनुशासन, आयु व श्रम; मकर-कुम्भ का स्वामी, रत्न नीलम।
  • राहुइच्छा, महत्वाकांक्षा व विदेश; छाया ग्रह, सदैव वक्री, रत्न गोमेद।
  • केतुवैराग्य, मोक्ष व पूर्व कर्म; छाया ग्रह, सदैव वक्री, रत्न लहसुनिया।

पूर्ण नवग्रह मार्गदर्शिका — देवता, मंत्र व उपाय →

ग्रह और बारह भाव

ग्रह अपना फल उस भाव से देता है जिसमें वह बैठा है और जिन भावों का स्वामी है। बारह भाव (भाव) जीवन के एक-एक क्षेत्र के स्वामी हैं — प्रथम स्वयं व शरीर, द्वितीय धन व कुटुंब, तृतीय पराक्रम व भाई, चतुर्थ घर व माता, पंचम संतान व सृजन, षष्ठ शत्रु व रोग, सप्तम विवाह व साझेदारी, अष्टम आयु व आकस्मिक घटना, नवम भाग्य व धर्म, दशम कर्म व प्रतिष्ठा, एकादश लाभ व मित्र, और द्वादश हानि, विदेश व मोक्ष। बलवान शुभ ग्रह जिस भाव को सक्रिय करे वह क्षेत्र फलता है; निर्बल या पाप ग्रह करे तो परीक्षा होती है। इसीलिए एक ही गोचर दो व्यक्तियों को भिन्न प्रभावित करता है — हर कुंडली में वह भिन्न भाव पर पड़ता है। इसे स्वयं पढ़ने हेतु जन्म कुंडली चाहिए; यहाँ की स्थितियाँ आज सबके साझा आकाश को दर्शाती हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वैदिक ज्योतिष में कितने ग्रह होते हैं?

वैदिक ज्योतिष नौ ग्रह (नवग्रह) मानता है — सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, और दो चंद्र-बिंदु राहु व केतु।

सिडरियल और ट्रॉपिकल ग्रह स्थिति में क्या अंतर है?

सिडरियल (निरयण) स्थिति स्थिर नक्षत्रों के सापेक्ष होती है और वैदिक ज्योतिष में लाहिरी अयनांश से गणना होती है; ट्रॉपिकल (सायन) स्थिति ऋतुओं/विषुव के सापेक्ष होती है और पश्चिमी ज्योतिष में प्रयुक्त है। दोनों में लगभग 24° का अंतर है।

कौन-से ग्रह शुभ और कौन अशुभ माने जाते हैं?

गुरु, शुक्र, पूर्ण चंद्र और शुभ-युक्त बुध को स्वाभाविक शुभ; शनि, मंगल, राहु, केतु, क्षीण चंद्र और पाप-युक्त बुध को स्वाभाविक अशुभ माना जाता है — पर वास्तविक फल कुंडली में उनके भाव व स्वामित्व पर निर्भर करता है।

ग्रह कितनी बार राशि बदलते हैं?

चंद्र ~सवा दो दिन में, सूर्य/बुध/शुक्र ~एक माह में, मंगल ~1.5 माह, गुरु ~एक वर्ष, शनि ~2.5 वर्ष, और राहु–केतु ~1.5 वर्ष में एक राशि बदलते हैं।

विवाह, करियर व धन के कारक ग्रह कौन हैं?

शुक्र (व सप्तम भाव) विवाह व जीवनसाथी का मुख्य कारक है; सूर्य, शनि व बुध — दशम भाव सहित — करियर तय करते हैं; गुरु धन का कारक है और द्वितीय व एकादश भाव आय के। कोई एक ग्रह अकेले नहीं — फल पूरी कुंडली पर निर्भर है।

अस्त (Combust) ग्रह क्या है?

सूर्य के अति निकट ग्रह "अस्त" होता है और निर्बल माना जाता है क्योंकि उसका प्रकाश दब जाता है। इसीलिए मुहूर्त नियम विवाह हेतु अस्त गुरु या शुक्र से बचते हैं। बुध व शुक्र, सूर्य के निकट रहने से, सर्वाधिक बार अस्त होते हैं।

गोचर और जन्म-स्थिति में क्या अंतर है?

आपकी जन्म-स्थितियाँ स्थिर हैं — वे आपके जन्म के क्षण का आकाश हैं और स्वभाव बताती हैं। गोचर वह है जहाँ ग्रह आज है, आपकी जन्म-कुंडली पर चलता हुआ। भविष्यवाणी दोनों की तुलना करती है: गोचर का महत्व तभी है जब वह आपके जन्म-ग्रहों के सापेक्ष देखा जाए।

क्या निर्बल ग्रह को बलवान किया जा सकता है?

पारंपरिक उपाय निर्बल या कष्टकारी ग्रह को सामंजस्य में लाते हैं — बीज मंत्र जप, उसके वार पर वस्तु-दान, उपवास, देवता-पूजा, और (योग्य ज्योतिषी के परीक्षण के बाद) उसका रत्न धारण। नवग्रह पृष्ठ प्रत्येक ग्रह का रत्न, मंत्र व वार देता है। उपाय प्रयास के पूरक हैं, विकल्प नहीं।