दिसंबर 2026 में संकष्टी चतुर्थी है। नीचे तिथि व समय दिए हैं, जो दिल्ली के लिए गणना किए गए हैं।
दिसंबर 2026 में एक संकष्टी चतुर्थी है — संकष्टी चतुर्थी (शनिवार, 26 दिसंबर, कृष्ण पक्ष)।
| तिथि | दिन | नाम | पक्ष / मास | तिथि आरंभ | तिथि समाप्त | चंद्रोदय |
|---|---|---|---|---|---|---|
| 26 दिस॰ 2026अगली | शनि | संकष्टी चतुर्थी | कृष्ण · Margashirsha | 25 Dec, 11:26 PM | 26 Dec, 8:5 PM | 26 Dec, 8:14 PM |
सभी तिथियाँ व समय नई दिल्ली (IST) के लिए स्विस एफ़ेमेरिस + लाहिरी अयनांश से गणना किए गए — नकल नहीं।
हर तिथि कब आरंभ होती है, कब समाप्त होती है और कितनी देर चलती है — सब दिल्ली (IST) के लिए गणना किया गया।
| तिथि | वार | पक्ष | चंद्र मास | आरंभ | समाप्त | अवधि |
|---|---|---|---|---|---|---|
| 26 दिस॰ | Saturday | Krishna | Margashirsha | 25 Dec, 11:26 PM | 26 Dec, 8:5 PM | 20 घंटे 39 मिनट |
संकष्टी चतुर्थी — 26 दिस॰, Saturday को, कृष्ण पक्ष, Margashirsha मास। तिथि 20 घंटे 39 मिनट चलती है (25 Dec, 11:26 PM से)। चंद्रोदय 26 Dec, 8:14 PM।
2026 में संकष्टी चतुर्थी की तिथि औसतन 23 घंटे 37 मिनट चलती है। दिसंबर में यह औसतन 20 घंटे 39 मिनट है — यानी इस साल के हिसाब से कुछ छोटी।
साल भर में यह अवधि 20 घंटे 33 मिनट (नवंबर) से 26 घंटे 27 मिनट (मई) के बीच रहती है। यह अंतर इसलिए होता है क्योंकि चंद्रमा की गति एक समान नहीं होती — तिथि की लंबाई हर बार बदलती है, इसीलिए व्रत की तारीख़ हर महीने आगे-पीछे खिसकती है।
2026 में कुल 13 संकष्टी चतुर्थी हैं, जिनमें से 1 इस महीने पड़ती है।
एक ही महीने में पड़ने वाले बाकी व्रत — तारीख़ के क्रम में।
| व्रत | तिथियाँ | कैलेंडर |
|---|---|---|
| कालाष्टमी | 1 दिस॰ (कालभैरव जयंती) · 30 दिस॰ (कालाष्टमी) | देखें |
| एकादशी | 4 दिस॰ (उत्पन्ना एकादशी) · 20 दिस॰ (मोक्षदा एकादशी) | देखें |
| प्रदोष व्रत | 6 दिस॰ (रवि प्रदोष) · 21 दिस॰ (सोम प्रदोष) | देखें |
| मासिक शिवरात्रि | 7 दिस॰ (मासिक शिवरात्रि) | देखें |
| अमावस्या | 8 दिस॰ (Bhaumvati Amavasya) | देखें |
| विनायक चतुर्थी | 13 दिस॰ (विनायक चतुर्थी) | देखें |
| स्कन्द षष्ठी | 15 दिस॰ (स्कन्द षष्ठी) | देखें |
| मासिक दुर्गाष्टमी | 17 दिस॰ (मासिक दुर्गाष्टमी) | देखें |
| मासिक कार्तिगाई | 21 दिस॰ (मासिक कार्तिगाई) | देखें |
| पूर्णिमा | 23 दिस॰ (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) | देखें |
संकष्टी चतुर्थी विघ्नहर्ता भगवान गणेश को समर्पित एक मासिक व्रत है, जो कृष्ण (घटते) पक्ष की चतुर्थी (चौथी तिथि) को रखा जाता है। चूँकि यह हर चंद्र मास में एक बार आती है, इसलिए वर्ष में लगभग बारह से तेरह बार इसका पालन होता है। "संकष्टी" का अर्थ है संकट से मुक्ति, और भक्त बाधाओं, चिंताओं और कष्टों के निवारण की प्रार्थना के साथ यह व्रत रखते हैं। हर मास की संकष्टी गणेश के एक विशेष नामरूप, जैसे वक्रतुंड या गणाधिप, को समर्पित होती है और उसकी अपनी कथा होती है।
संकष्टी की विशेषता यह है कि व्रत रात्रि में चंद्र दर्शन के बाद ही खोला जाता है। भक्त चंद्रोदय की प्रतीक्षा करते हैं, चंद्रमा और गणेश को अर्घ्य (जल) अर्पित करते हैं, और तभी भोजन ग्रहण करते हैं — इसीलिए चंद्रोदय का समय दिन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण होता है। यह पृष्ठ हर तिथि के लिए चंद्रोदय का समय दर्शाता है ताकि आप पूजा और व्रत खोलने की योजना बना सकें। परंपरा के अनुसार चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत पूर्ण माना जाता है।
जब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार को पड़ती है, तो उसे अंगारकी संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। मंगलवार अंगारक (मंगल) का दिन है, और यह दुर्लभ संयोग परंपरागत रूप से सभी संकष्टियों में सबसे शक्तिशाली और शुभ माना जाता है। यह कई वर्षों में केवल गिने-चुने अवसरों पर ही आती है, इसलिए बहुत से भक्त अंगारकी व्रत रखने का विशेष प्रयास करते हैं। इसकी विधि किसी भी संकष्टी जैसी ही होती है — दिनभर का व्रत, गणेश पूजा और रात्रि में चंद्र दर्शन।
व्रती दिनभर उपवास रखते हैं; कई लोग केवल फल और सादा व्रत आहार लेते हैं, जबकि कुछ चंद्रोदय तक बिना अन्न-जल के व्रत रखते हैं। दिन का केंद्र गणेश पूजा होती है: दूर्वा घास, पुष्प और मोदक या लड्डू अर्पित करना, दीप जलाना, और उस मास की संकष्टी कथा पढ़ना या सुनना। रात्रि में चंद्रमा के दर्शन के बाद चंद्रमा और गणपति को अर्घ्य दिया जाता है और प्रसाद के साथ व्रत खोला जाता है। यह व्रत किसी सौदे के रूप में नहीं, बल्कि श्रद्धा और धैर्य के साथ रखा जाता है।
दोनों ही गणेश के चतुर्थी व्रत हैं, पर ये मास के अलग-अलग पक्षों में आते हैं। संकष्टी चतुर्थी कृष्ण (घटते) पक्ष की होती है, जिसकी पूजा रात्रि में होती है और चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोला जाता है। विनायक चतुर्थी शुक्ल (बढ़ते) पक्ष की होती है, जिसकी पूजा दिन में मध्याह्न के समय होती है और उसमें चंद्र दर्शन नहीं होता। आप किस पक्ष में हैं, यह जानकर पता चलता है कि कौन-सा व्रत लागू होता है। यह पृष्ठ संकष्टी व्रत के लिए है, जिसमें रात्रि का चंद्र पूजन और हर मास का नामरूप शामिल है।
परंपरा कहती है कि एक बार देवता किसी बड़े विघ्न से व्याकुल होकर सहायता के लिए भगवान शिव के पास गए। शिव ने अपने दोनों पुत्रों गणेश और कार्तिकेय की ओर देखकर पूछा कि इस कठिनाई को कौन दूर कर सकता है। यह तय करने के लिए कि अधिक योग्य कौन है, उन्होंने एक परीक्षा रखी: जो सबसे पहले पूरे संसार की परिक्रमा कर लेगा, वही विजयी होगा। कार्तिकेय तुरंत अपने मोर पर सवार होकर पृथ्वी की परिक्रमा करने निकल पड़े। किंतु बुद्धिमान गणेश ने केवल अपने माता-पिता शिव और पार्वती की परिक्रमा कर ली, यह कहकर कि वे ही उनका संपूर्ण संसार हैं — और इस प्रकार वे विजयी तथा विघ्नहर्ता घोषित हुए। इसी से, ऐसा कहा जाता है, भक्त संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखते हैं और गणेश से अपने संकट दूर करने की प्रार्थना करते हैं, तथा चंद्रोदय के बाद ही व्रत का पारण करते हैं। प्रत्येक मास की संकष्टी की अपनी अलग नामित कथा भी होती है।
व्रत आरंभ करने से पूर्व ये सामग्री एकत्र कर लें ताकि पूजा बिना किसी बाधा के संपन्न हो सके:
2026 में दिल्ली क्षेत्र के लिए 13 संकष्टी चतुर्थी हैं — प्रत्येक चंद्र मास में एक।
संकष्टी व्रत चंद्र दर्शन के बाद ही खोला जाता है, इसलिए चंद्रोदय समय तय करता है कि आप कब भोजन कर सकते हैं। नीचे प्रत्येक तिथि का दिल्ली चंद्रोदय दिया है।
माघ मास की संकष्टी चतुर्थी सकट चौथ (या लंबोदर संकष्टी) कहलाती है, जिसे माताएँ अपने बच्चों के कल्याण के लिए विशेष रूप से रखती हैं।
जब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार को पड़ती है तो वह अंगारकी चतुर्थी कहलाती है, गणेश पूजा हेतु विशेष प्रभावी मानी जाती है — एक अंगारकी को अनेक का फल कहा जाता है। यह वर्ष में एक-दो बार ही आती है।
भक्त दिनभर व्रत रखते हैं, गणेश पूजा व संकष्टी व्रत कथा करते हैं, और चंद्र दर्शन कर अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोलते हैं — प्रत्येक तिथि का चंद्रोदय समय ऊपर दिया है। मोदक या तिल-गुड़ अर्पित किए जाते हैं।
व्रत प्रायः चंद्रोदय तक रखा जाता है, फिर फलाहार से खोला जाता है — फल, साबूदाना, आलू, तिल व गुड़ सामान्य हैं। कठोरता व्यक्तिगत चुनाव है।
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